चित्रकूट में त्रेता युग के कुंवरदो तालाब के पुरेन पत्ते शुभ कार्यों में होते हैं प्रयोग
चित्रकूट के रामनगर कस्बे स्थित कुंवर दो तालाब में खिलने वाले कमल व पुरेंन का पत्ता शादी विवाह व तेरहवीं भोज तथा भंडारे आदि में बहुत शुभ माना जाता है। इसमें भोजन खाने से बहुत आनंद स्वादिष्ट व शुद्धता की अनुभूति होती है। दसको पहले लोग इसी तालाब से पुरेन्न के पत्तो को तोड़ कर घर ले जाते थे सादी विवाह तथा अन्य मांगलिक कार्यों में लोगो को भोजन के लिए पंगत में बैठा कर इन्हीं पत्तो में भोजन परोसा जाता था। भोजन के उपरांत पत्तल को लेे जाकर लोग खेत में फेकते थे जिससे पत्तल सूखकर खाद के रूप में हो जाता था जिससे किसानों के खेतों की उपज में भी बढ़ोत्तरी होती थी। अब मशीनरी युग व रोज नए नए अविष्कार होने के चलते यह पुरानी चीजें जो विलुप्त होती जा रही है, अब लोग थर्माकोल की प्तत्तल दोना का प्रयोग कर उन्हें जलाते है जिससे प्रदूषण का बराबर खतरा बना रहता है और अनेकों प्रकार की बीमारियों से खतरा बना रहता है।
बदलते परिवेश व समय के साथ अब लोग इस पत्ते का इस्तेमाल नहीं करते
पर ग्रामीण क्षेत्रो में कुछ लोग आज भी खाने व मांगलिक कार्यों में पुरेण के पत्तो का भोजन परोसने में इस्तेमाल करते।
पूरेन्न के पत्ते से लेकर फूल, फल व जड़ भी है औषधि
परेन्न के पत्तो से हरा-भरा तालाब व उसमे खिले कमल के फूल हर तरफ खुशबू व सादगी के साथ मनमोहक लगाते हैं एक पल के लिए देखने वालो का ध्यान उस तालाब कर केंद्रित हो जाता है। इसमें खिलने वाले कमल पुष्प को माता लक्ष्मी जी को चढ़ाया जाता है यह बहुत शुभ माना जाता है लोग देव स्थानों में यज्ञ आदि अनुष्ठानों में विशेष रूप से इस के कमल के पुष्प को चढ़ाते हैं। इन फूलों के बीच में बीज होते हैं जिन्हें गांव की भाषा में कमलगट्टा कहते हैं लोग इनके बीज से मखाना बनाने का कार्य करते है जो बहुत ही पौष्टिक होता है।तथा इसकी जड़ इसकी जड़ की लोग शबजी बनाते हैं और दवा के रूप में भी प्रयोग करते हैं। बताया जाता है इसकी सब्जी खाने से चेहरे की चमक नहीं जाती और किसी किसी प्रकार का रोग नहीं होता यह बहुत ही निरोगी जड़ होती है इसके सेवन से हर प्रकार का दर्द ठीक हो जाता है।इस जड़ को गड़ी वर सीन बोलते हैं यह ₹40 ₹50 किलो बाजार में बिकती है।जिससे लोगो को रोजगार मिलता है।
रामनगर कस्बे के निवासी हीरा लाल मिश्रा ने बताया कि इस तालाब का पौराणिक इतिहास है इसका उल्लेख रामायण की चौपाइयों में भी देखने को मिलता है बताया जा रहा है त्रेता युग में वनवास काल के दौरान भगवान श्री राम माता जानकी भ्राता लक्ष्मण जी के साथ यहां रात्रि विश्राम किए थे और इसी तालाब में नहाए थे जिसके चलते इस कस्बे का नाम रामनगर व तालाब का नाम कुंवर दो पड़ा।तब से लेकर इस तालाब में खिलने वाले कमल व इसमें पूरेन के पत्तो को बहुत ही शुद्घ माना जाता है, क्षेत्र व दूर दराज के लोग शादी व धार्मिक कार्यों,अनुष्ठान पूजा आदि में इस तालाब के पुष्प को पूजन में व पत्तलों में खाने का इस्तेमाल करते हैं।