चित्रकूट के पाठा में महुआ बना रोजगार
चित्रकूट के पाठा क्षेत्रो में जहा गर्मी का सीजन सुरु होते ही फसलों के कटने के बाद ज्यादातर युवा व पुरुष रोजगार की तलाश में शहरों कि ओर पलायन करते हैं तो वहीं घरों में रहने वाली महिलाए भी गर्मियों के दिनों में सुबह से कड़ी मेहनत कर देर शाम तक जंगलों में महुआ बिन इकट्ठा कर रोजगार करते हुए परिवार का भरण पोषण करती है। महूए को सुखा कर बेचने पर उन्हें अच्छा खासा पैसा मिल जाता है जिससे उनके परिवार का भरण पोषण पुरुषों के लौटने तक आराम से चल जाता है।यदि आज के समय में देखा जाय तो सुखा महुआ बाजार में 4 – 5 हजार रूपए कुंटल के हिसाब से बिकता है। लेकिन आधुनिक युग की दौड़ में आज के परिवेश में लोग महुआ की खूबियों को भूलते जा रहे हैं।
महुआ का सीजन साल में अप्रैल माह में सुरु हो जाता है, बसंत ऋतु के आगमन के बाद महुआ पे पेड़ो में फूल लगने सुरु हो जाते हैं फिर गर्मी अप्रैल आते हैं फल का रूप लेने लगते हैं। महिलाएं प्रातः भोर में उठ कर टोकरी दलिया आदि लेकर पेड़ो के नीचे पहुंच जाती है और दोपहर तक महुआ बिनती है।महुआ को इकट्ठा लेकर घर में खुले आसमान के नीचे घुप में सुखाती है।
महुआ को बेचने के अलावा बुन्देलखण्ड में खाने के लिए भी लोग इस्तेमाल करते है। बरसात के दिनों में महुआ को भूंज कर लोग चूर्ण तैयार करते हैं तो वहीं महुआ को उबालकर दूध दही के साथ भी बड़े चाव से खाते हैं,महुआ का महिलाए मीठा पुवा भी बनाती है, ग्रामीण महिलाओं की माने तो कुछ बुजुर्ग महिलाए बताती है कि गर्भवती महिलाओं के प्रसव के पश्चात उनको महुआ का विशेष चूर्ण तैयार कर खिलाया जाता है जिससे शरीर ने कमजोरी नहीं आती। तथा गर्मी के दिनों में सत्तू के साथ खाने पर कभी पेट खराब नहीं होता, नियमित महुआ के खाने से शरीर स्वस्थ्य रहता है,जल्दी ज्वर जैसी गंभीर बीमारी नहीं आती। वहीं महुआ बेच कर घर के खर्चे भी आसानी से चलते है।दूर दराज से व्यापारी ग्रामीण इलाकों से महुआ खरीद कर लेे जाते है जिससे घर बैठे रोजगार भी होता है और परिवार का भरण पोषण भी होता है, गर्मी के दिनों में महुआ चित्रकूट के पाठा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में किसी वरदान से कम नहीं है।
रिपोर्ट – आशीष उपाध्याय